‘ख़ाकी रंग से बना हिमालय’

ख़ाकी मां को नमन करती शहीद सैनिक की आत्मा

मांग मिट्टी आज कुछ भी, मैं खड़ा तेरे बदन पर,
माफ़ करदे पुत्र तेरा, निगाह मेरी आसमां पर,
पर्वतों से निकले पानी, मीठा रस खेतों में बहता,
सैनिकों का खून उबलता, दुश्मनों पर जा फहरता,

गर मरूं तो अर्ज इक है, ख़ाकी चमन पर जा गिरूं,
मौत को भी फक्र हो जो, मुस्कराता हिम्मत भरूँ,
कण कण तेरा हाँथ में हो, होंठ चूमता जा गिरे,
थाम तेरे दामनों को, मिट्टी कफ़न बन आ गिरे,

इस धरा का मान रखने, जा लड़ूंगा दुश्मनों से,
गीत गाता हर परिंदा , जा मिलेगा उस गगन से,
सात रंगों की हर बेला पर, नमन हर ख़ाकी को है,
केसरी अभिमान के संग, इश्क़ वतन से हमको है,

आज तक तुमने दिया है, हम पुत्र बन लहरा रहे हैं,
ये वक़्त पल है दे रहा, कुछ कर सकूं फिर जा रहे हैं,
सैनिकों की मंडली बन, हैं खड़े ऊंचे भवन पर,
केसरी भगवान को ले, जीत दुनिया ला रहे हैं,

हर पवन को खुश्बुओं से, महका चमन को दे उजाला,
हर यौवन को ठाट दिल से, रखा कृष्ण सा प्रेम ग्वाला,
ये समय अब मांग रहा है, इस जीवन के वक़्त की पूजा,
मातृशक्ति को कर नमन फिर, कर्ज़ वतन का चुका रहे हैं.

संदीप यादव उपन्यासकार
संदीप यादव उपन्यासकार

संदीप यादव उपन्यासकार

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